लव-जिहाद : एक ऐसी कपोल कल्पना जिस पर विश्वास करने वाला तंत्र सांप्रदायिक होने के साथ-साथ झूठे मर्दाने गर्व का शिकार भी है


love jihad लव-जिहाद : एक ऐसी कपोल कल्पना जिस पर विश्वास करने वाला वाला तंत्र सांप्रदायिक होने के साथ-साथ झूठे मर्दाने गर्व का शिकार भी है

सुना है 21वीं सदी के भारत में रामराज चल रहा है और रामराज हो भी क्यों ना?..एक ऐसे समय में जब राम के स्वघोषित ठेकेदारों का बोलबाला हों, संस्कृति के स्वयंभू रक्षक चरमोत्कर्ष पर हों तो भारत का रामराज से अछूता रह जाना शोभा नही देता. लंबे अरसे से ऐसी आशा थी कि भारत 21वीं सदी में आधुनिकता की चरम अभिव्यक्ति का गवाह बनने वाला है और अब रामराज का आना इन आशाओं पर पंख लगाने जैसे था लेकिन अफसोस कि स्वयंभू रक्षकों द्वारा संस्कृति की दुहाई देकर, आधुनिकता की चतुरंगिणी सेना का नेतृत्व कर रही व्यक्तिगत-स्वतंत्रता की पीठ पर किये गये वार से रामराज की अवधारणा ही तार-तार हो गई है.

संस्कृति-रक्षा के तथाकथित पुरोधा सामंतवादी मानसिकता से ग्रस्त है जो विश्वास करते हैं कि,
‘गर्ल्स एंड ˈवुमेन्‌ भोली होती हैं जिन्हे कोई भी बहला-फुसला लेता है एवं वे इतनी परिपक्व नहीं होती कि अपना जीवन-साथी चुन सकें!’
..ऐसे विचार पुरुषवादी पितृसत्तात्मक कोढ़ का ही एक रूप है जो आज भी पुरुषों को गर्ल्स एंड ˈवुमेन्‌ का भाग्य-विधाता समझता है, जो गर्ल्स एंड ˈवुमेन्‌ के जीवन को निर्धारित करने की चाह रखता है.

‘प्यार’ के साथ ‘जिहाद’ जोड़कर समुदाय विशेष को निशाना बनाने वाला तंत्र साम्प्रदायिक होने के साथ-साथ झूठे मर्दाने गर्व का शिकार भी है. हाल के दिनों में, ख़ुद की मानसिक विकृत की उपज ‘लव-जिहाद’ को केंद्र में रखकर कई राज्य सरकारों ने, किसी भी व्यक्ति-विशेष के अपने पसंद के जीवनसाथी चुनने के अधिकार का गला घोंटने के साथ ही जीवन, स्वायत्तता तथा गोपनीयता के मौलिक अधिकार को धता बताने वाले कानून बनाये हैं जिनकी जड़ें पितृसत्ता से जुड़ी हुई प्रतीत होती हैं, जो व्यक्तिगत गरिमा के खिलाफ होने के साथ-साथ सामाजिक ताने-बाने को छेड़ रहा है. फलतः समाज मे समुदाय विशेष के विरुद्ध अलगाव एवं नफरत दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है.

उल्लेखनीय है कि,
रिˈस्‍पे᠎̮क्‍टेड सुप्रीम कोर्ट ने ‘जीवन साथी चुनने के अधिकार’ को शफीन जहां बनाम अशोक केएम (2018) मामले में भारतीय संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत प्राप्त अधिकारों का हिस्सा बताया लेकिन विडंबना यह है कि यदि हिन्दू लड़की ने अपने पसंद के व्यक्ति से विवाह करना चाहा और ..गर वह लड़का मुस्लिम निकला तो लड़की विशेष का प्यार, अधिकार, गरिमा एवं स्वतंत्रता सब कुछ साम्प्रदायिक दुष्प्रचार के भेंट चढ़ जायेगा. अब ‘जीवन साथी चुनने के अधिकार’ पर लव-जिहाद का ठप्पा लगाया जाएगा, गाजे-बाजे के साथ इस सफेद झूठ को दुष्प्रचारित किया जाएगा कि मुस्लिम लड़के सोची समझी साजिश के तहत हिन्दू लड़कियों को फंसाते हैं ताकि उन्हें धर्मांतरण के जरिये मुस्लिम बनाया जा सके.. इसीलिए विषेकर ऐसे समय में नागरिक होने की जिम्मेदारी पहले से कहीं ज्यादा बढ़ जाती है. कहते तो हैं कि, हम भारत के नागरिक हैं लेकिन यह अर्द्ध-सत्य है क्योंकि नागरिक बनना सबसे कठिन कार्य है, नागरिक बनने का मतलब स्वयं के दायित्व-बोध से है, नागरिक बनने का मतलब दुष्प्रचार के जहर से समाज को बचाने से, नागरिक बनने का मतलब सामाजिक सौहार्द बनाए रखने से है.

हम सब जन को सामाजिक इकाई के रूप में समझना होगा कि आज लव-जिहाद के साम्प्रदायिक दुष्प्रचार का डर दिखाकर तंत्र द्वारा नागरिकों की वैयक्तिक स्वतंत्रता पर हमला किया जा रहा है. विशेषकर गर्ल्स एंड ˈवुमेन्‌ के अधिकारों का हनन एक ऐसी निरीह आबादी को तैयार करने का प्रयास है, जो ख़ुद की पहचान की परवाह किये बगैर वही करती है जैसा उसे बताया जाता है तथा सामाजिक-पारिवारिक दृष्टि से सर्वमान्य नैतिकता के खिलाफ विद्रोह नहीं करती है। आज रूढ़िगत नैतिकता के बोझ तले गर्ल्स एंड ˈवुमेन्‌ के स्वायत्तता के अधिकार को दबाया जा रहा है जो उनके आधुनिक जीवन को सामंत-युगीन खाई की ओर धकेल रहा है. स्पष्टतः किसी भी सभ्य समाज की सेहत के लिए सांप्रदायिक दुष्प्रचार फायदेमंद नही हो सकता है.

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में आज वैयक्तिक स्वतंत्रता पर किए गए हमले की समाज में स्वाभाविक स्वीकार्यता चेतना के ऑक्सीजन की कमी को प्रतिबिम्बित करती है. वैसे भी भारत मे आलोचनात्मक वृत्ति के ह्वास के साथ लोकतंत्र में आई कमी वैयक्तिक स्वतंत्रता के अधिकार को दुर्लभ बनाती है. ऐसे में तंत्र द्वारा खुद को लोकतांत्रिक दिखाने की चाह एक सुंदर छलावा मात्र है.

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