स्त्री-वर्ग के सपनों की लगाम भला पुरुष के हाँथों में क्यों हो?


स्त्री-वर्ग के सपनों की लगाम भला पुरुष के हाँथों में क्यों हो?

आदिम युग से आज तक कालक्रम का विकास इस कटु-सत्य को प्रतिबिंबित करता है कि, भारतीय समाज में स्त्री-वर्ग एक लंबे अरसे से बहुआयामी शोषण का शिकार होता आया है.

आखिर कारण क्या है?

पुरुषत्व के प्रदर्शन ने स्त्री के मातृत्व पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया परिणाम स्वरूप इस विचार को बल मिला कि, स्त्री तो सिर्फ बच्चे को जन्म देती है चूँकि सुरक्षा प्रदान करने का कार्य तत्कालीन समाज में पुरुषों के हाथ में था तो जीवन देने से ज्यादा जिंदगी को कायम रखने की जतन को अहमियत मिली. अब वही हुआ जिसका डर था.. स्त्री के मातृत्व ने स्त्री को बंधन में जकड़ लिया. तत्पश्चात स्त्री-वर्ग के निरंतर, अनवरत, अबाध रूप से चलने वाले दमन का खेल प्रारम्भ होता है. जाहिर तौर पर सत्ता पुरुषों के हाथ में थी तो धर्म, मूल्य, आचरण पुरुषों की सहूलियत के हिसाब से गढ़े जाने लगे. बेहद अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि, पुरुष समाज हर रोज नए-नए मूल्य गढ़ता गया और स्त्रियों पर जबरदस्ती थोपता गया. अब तय किया जाने लगा कि, स्त्री कैसे रहे?..और कैसे जिए?

दिन प्रतिदिन स्त्रियों की हालत बद से बदतर होती चली गई, प्रतिक्रिया स्वरूप भी कुछ अपवाद को छोड़ दें तो स्त्री वर्ग ने पुरुष के एकाधिपत्य को कभी चुनौती नहीं दी बल्कि स्त्रियाँ इस स्थिति से स्वयं को अनुकूलित करती गईं… यहीं से स्त्रियों के सपनों की उड़ान स्वतंत्र ना होकर, उसकी लगाम पुरुषों के हाथ में चली गई.

..जो हुआ सो हुआ लेकिन आज समय है किसी वर्ग-विशेष के आधिपत्य को ना कहने का, सपनों की पतंग की डोरी खुद के हाथ में पकड़ने का, उठ खड़े हो.. आगे आओ, जहां भी अन्याय होता दिखे भिड़ जाओ.

आखिर गर्ल्स एंड विमेन ही क्यों..हम सब जन इकाई के रूप में, बिना किसी सामाजिक-पारिवारिक दबाव के, जहां कहीं भी बाल-विवाह, लिंगाधारित गर्भपात, लैंगिक दुर्व्यवहार, लिंग-विकृत, शारीरिक-मानसिक उत्पीड़न, बाल वेश्यावृत्ति, विकलांग स्त्रियों के प्रति दुर्व्यवहार, विधवा उत्पीड़न, आर्थिक तंगी के नाम पर विधवाओं की हत्या एवं शारीरिक मानसिक यौन उत्पीड़न सरीखे आपराधिक कृत्य दिखे, रिपोर्ट करें… संभव है कि, सामाजिक मूल्य, आचार-विचार नागरिक होने के कर्तव्य-बोध में भी बंदिशें लगा सकता है तो बेशक इन बंदिशों को तोड़ना होगा.

सामाजिक दिखावे के लिए दहेज के विरुद्ध होना एक अलग बात है लेकिन परिवार को सहमति के बिंदु पर राजी करना साथ ही बिना दहेज विवाह के लिए अटल रहना.
.. उपर्युक्त वर्णित जो छोटे-छोटे बिंदु हैं जो self से लड़ने में भी मददगार साबित होंगे.

एक विशेष अनुरोध विशेषकर युवा पुरुष-वर्ग से है कि,
आप समझने की कोशिश करिए कि आप ‘प्रिविलेज्ड’ हैं, विशेषाधिकार आपको विरासत में मिले हैं तो सर्वप्रथम स्वयं के विशेषाधिकारों को ‘अक्‌ˈनॉलिज्‌’ करिए साथ ही समता मूलक समाज की स्थापना के लिए आगे आइए स्वयं के विशेषाधिकारों का त्याग करिए साथ ही स्त्रियों की तकदीर लिखने का कुंठित प्रयास बंद कर दीजिए, जीने दीजिए स्त्रियों को उनकी जिंदगी.. आत्म विश्लेषण करके खुद से पूछो तो सही-
“आखिर स्त्री-वर्ग के सपनों की लगाम भला पुरुष के हाँथों में क्यों हो?”

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