स्त्री को गृहणी तक सीमित कर देना असीम संभावनाओं का गला घोंटने जैसा है


स्त्री को गृहणी तक सीमित कर देना असीम संभावनाओं का गला घोंटने जैसा है

आपके कार्य को यश मिला…वाह!
यशस्वी महिमामंडन ने ही आपको भ्रमित किया, घर के काम के बोझ तले आपका-अपना व्यक्तित्व गौण होता जा रहा है, आखिर कब तक आप अपने झूठे महिमामंडन की चाह या फिर जबरजस्ती थोपे गए कार्यों की जिम्मेदारी में घुटते रहेंगे, आपका अपना व्यक्तित्व, स्वयं की विशिष्ट पहचान आपके लिये अंतिम प्राथमिकता क्यों..?

वह स्त्री जो सुबह से देर रात तक स्वयं को घर के विभिन्न कार्यों में झोंके रहती है, अचानक एक दिन उसको ताने भरे लहजे में यह सुनने को मिलता है कि,
“तुम करती ही क्या हो?”
कुछ समझ आया?..जिसने काम के बोझ तले, आदर्श गृहणी बनने की चाह में खुद की पहचान मिटा दी उसी पर अस्तित्व संकट के बादल मंडराने लगे.

स्पष्ट है कि,
अगर 4-6 कार्यों की जिम्मेदारी एक ग्रहणी उठा रही है तो न्याय की कसौटी है कि, कार्यों का बंटवारा परिवार के अन्य सदस्यों में भी होना चाहिए….

…स्त्री को कॉस्मेटिक एवं कुलवर्धनात्मक उपयोग तक सीमित किये बगैर उसकी सामर्थ्यता को विस्तार मिले, स्त्रियों को दोयम दर्जे का नागरिक समझने के बजाय व्यवहारिक धरातल पर बराबरी का अधिकार मिले जिसे राजनीतिक-आर्थिक-मानसिक-चारित्रिक विकास के समान अवसर प्राप्त हो, स्त्री वर्ग को पुरुषों की बैसाखी के बगैर स्वतंत्र विशिष्ट पहचान मिले… सबसे जरूरी बात कि, स्त्री वर्ग का आर्थिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए. इसके लिए जरूरी है कि, स्त्री-वर्ग को दबे स्वर में यह कहने के बजाय कि,
“हमने माँगा नहीं, इसका यह मतलब नहीं कि, हमने कभी चाहा नहीं.”
..आपको ऊंचे स्वर में अपने अधिकारों की मांग को बुलंद करना होगा. इस लड़ाई को हर रोज, हर दिन लड़ना होगा जिनकी शुरुआत अपने घर से करनी होगी तब कहीं जाकर व्यावहारिक धरातल पर आपकी स्थिति, आपके सामाजिक स्तर में सुधार हो सकता है.

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