सामाजिक भेद-भाव बीते जमाने की बात है जिसका आज की दुनिया से कोई सरोकार नहीं है


सामाजिक भेद-भाव

सामाजिक भेद-भाव बीते जमाने की बात हो गई? ..अरे वाह! कब हुआ ये?..आखिर हुआ कब?

मैं तो यही समझता था कि, भेद-भाव ही एकमात्र ऐसा विचार है जो हमारी रग-रग में भरा हुआ है. यद्यपि ‘अस्पृश्यता’ के अन्त होने तथा उसके किसी भी रूप में आचरण को निषिद्ध किये जाने की बात हमने किताबों में जरूर पढ़ी है लेकिन व्यावहारिक धरातल पर नजर घुमाने के पश्चात मेरे मन मस्तिष्क में, आदर्शवादिता की चिड़िया उड़ाकर “कानून की नजर में सब जन समान हैं” कहने वालों के लिए, स्वतः ही प्रश्न की बिजली कौंध उठती है कि, अरे! लच्छेदार बातें करने वालो खुद से नजरें तो मिलाओ, बात तो करो, पूछो खुद से भला सामाजिक वंचना क्या बला है, जरा सोचो, अपने दिमाग पर जोर डालो कि, क्या आपने कभी भी अपनी जिंदगी में छुआछूत की उस आग को महसूस किया है जिससे समाज के एक तबके को हर रोज, हर पल झुलसना पड़ता है?

अपनी जाति की उद्घोषणा करके इतराने वाले द्विजों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) से पूछना चाहता हूँ कि, ये जो संयोग वश मिली जाति पर गर्व महसूस कर रहे हो तो जरा ठिठककर विचार तो करो कि, क्या ये गर्व का भाव उस वर्ग को भी संयोग में मिला है जिसे सदियों-सदियों तक आपने इंसान ही नहीं समझा? ..खैर, मेरे व्यक्तिगत विचार में ‘संयोग पर गर्व’ एक घृणित सोच है लेकिन फिर भी मेरे व्यक्तिगत विचारों से इतर क्या आपने कभी खुद के ‘प्रिविलेज्ड’ होने का एहसास किया? .. क्या आपने महसूस किया की जाति पर गर्व करने का भाव महज़ विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग को है ना कि समाज के हर तबके को.
.. शायद नहीं!
यदि महसूस किया होता तो आदर्शवादी-समानता की चिड़िया उड़ाने की जुर्रत नहीं करते.

इस संदर्भ में चंद महीनो पहले का वृतांत प्रस्तुत करना चाहूंगा जिसकी पृष्ठभूमि में ग्रामीण जीवन है-

मैं इन दिनों स्वयं के गृह-परिसर में चंद दिनों का मेहमान हूँ साथ ही मैं यहाँ के रिहायसी-वातावरण को अत्यंत करीब से टकटकी लगाकर निहारने की कोशिश कर रहा हूँ, न सिर्फ निहारने की अपितु समझने के लिए प्रयासरत हूँ कि आखिर हमारे ग्रामीण रिहायशी-वातावरण की सामाजिक दशा क्या है, मानसिक विकास का स्तर क्या है?

अचानक!
मैंने महसूस किया कि, मेरे मन मस्तिष्क में एक ज्वलंत-जिज्ञासा कि, वह समाज जिसने आधुनिक एवं सभ्य होने का चोला पहना हुआ है, क्या वाकई जमीनी हकीकत में आधुनिक है, कौतूहल पूर्ण ढंग से गुंजायमान हो उठी.

मैं स्वयं के वास्तविक अनुभवों के आधार पर उपर्युक्त वर्णित स्वयं की जिज्ञासा का समाधान करना चाहूंगा साथ ही मैं आपको बताना चाहूंगा कि, वर्तमान में हमारे गांव में धान की खेती हो रही है अर्थात ‘रोपा’ लगाया जा रहा है. हमारे खेतों में जो लोग धान लगाने आते हैं, वे अपने साथ अपने बच्चों को भी लाते हैं.
(.. वे लोग खेतों में धान की रोपाई में जुट जाते हैं साथ ही उनके बच्चों में तुलनात्मक रूप से बड़े-बच्चे अपने छोटे भाई-बहनों का ख्याल रखते हैं.)

हाल ही में घटित हुए स्वयं के वास्तविक अनुभव को आप लोगों के साथ साझा करना चाहूंगा-

मैंने देखा कि, हमारे द्वार पर दो-बच्चे (हमारे खेतों में रोपाई करने वाले लोगों के बच्चे थे.) खेल रहे हैं.
(बड़े-बच्चे की उम्र यही कोई 7-8 वर्ष की रही होगी, छोटी बच्ची 5-6 साल की रही होगी.)
.. तत्पश्चात मैं आंगन में बैठा था. फिर वही छोटी बच्ची हाथ में जग लेकर मेरे सामने आकर खड़ी हो गई. (उसने कुछ बोला नहीं.)

मैंने कहा- ..पानी चाहिए?

(सम्मान-जनक शब्दों के साथ, ‘तू-तकाड़’ वाली भाषा में नहीं, बताना जरूरी है क्योंकि यहाँ तथाकथित अछूतों के चिरागों के साथ तू-तकाड़ में बात करना बहुत ही आम बात है.)

बच्ची- हाँ.

.. मैंने पानी निकाल कर दिया फिर वे लोग दोबारा साथ में खेलने लगे साथ ही मैं भी उन लोगों के साथ जाकर बैठ गया, कुछ हल्की फुल्की बातें करने लगा तत्पश्चात,

दीदी खाना खाने के लिए बुलाती है.

मैंने कहा कि, मैं इनके (बच्चों) साथ खाना खाऊंगा, बच्चों के लिए भी खाना लगा दो.

(एक थाली मेरे लिए, एक थाली उन दोनों बच्चों के लिए, हां उन दोनों लोगों ने एक साथ, एक थाली में खाना खाया.)

हमने साथ में खाना खत्म किया, मैंने थाली में हाथ धो दिया लेकिन वह बड़ा-बच्चा थाली उठाकर जाने लगा…

..मैंने कहा- कहाँ जा रहे हो?

बच्चा- थाली धुलने.

(मैं शर्म से पानी-पानी हुए जा रहा था, मन ही मन खुद को कचोट रहा था, खुद से नजरे नहीं मिला पा रहा था कि, आखिर मेरे सामने है यह हो कैसे गया, हाँ मेरे सामने जिसने जातिवादी-मानसिकता के विरुद्ध बड़ी-बड़ी बातें की थी, जो जन्म के आधार पर ‘ऊंच-नीच’ निर्धारित करने वाली मानसिकता का कटु-आलोचक रहा, उसी के सामने एक सात साल, महज सात साल का मासूम बच्चा जिसे पता भी नहीं कि, ये जातिगत-गुत्थी है क्या, वही 7 साल का बच्चा, जन्म के आधार पर हमारे परिवार को श्रेष्ठ समझ रहा था साथ ही स्वयं को छोटा…
..यही है inferiority complex, इसे ही कहते हैं हीन-भावना से ग्रस्त होना.)

मैं- नहीं, थाली नीचे रखो चुपचाप.

बच्चा- पापा डाँटेंगे.

मैं- बिल्कुल नहीं, कोई कुछ नही कहेगा.

(बच्चे के हाँथ से जूठी-थाली लेकर स्वयं की जूठी-थाली पर रखकर, दोनों बच्चों का हाँथ धुलाते हुये.)

..बाद में मम्मी ने बताया कि वे लोग अनुसूचित जाति से संबंध रखते हैं.

उपर्युक्त वर्णित बातें पढ़कर क्या महसूस हुआ आपको?

बेशक!
आप स्वयं की वैचारिक अभिव्यक्ति को टिप्पणी के जरिए अवगत कराएं लेकिन मैं कुछ और साझा करना चाहता हूं.

मैं बताना चाहता हूं कि मेरे गांव में तथाकथित अछूत-वर्ग को सवर्ण-वर्ग के साथ भोजन करने का अधिकार नहीं है,

(मेरे व्यक्तिगत परिवार में ऐसा कुछ भी नहीं है, हमारे परिवार के प्रत्येक सदस्य बिना किसी सामाजिक-पारिवारिक बंधन के तथाकथित अछूत-वर्ग के साथ बैठकर खाना खाता है लेकिन चाय पीने के बाद कप धुलना, खाने के बाद थाली धुलना जैसी घृणित मानसिकता का प्रचलन अभी भी है जिसके खात्मे को लेकर मैं व्यक्तिगत रूप से मेरे मम्मी-पापा से बात कर चुका हूँ तत्पश्चात हमने प्रयास भी किया लेकिन वे (अछूत) हीन-भावना से ग्रस्त होने के कारण मानते ही नहीं…

..चाय पीने के बाद कप जरूर धुलेंगे.

हमारे तथाकथित अछूत वर्ग के साथियों की इन भावना के लिए भी कहीं ना कहीं हम नहीं बल्कि पूर्णरूपेण हम ही जिम्मेदार हैं.)

सामाजिक छुआछूत की जड़ें ग्रामीण स्तर पर अभी भी काफी गहरी है. याद है मुझे लगभग डेढ़ साल पुरानी वह बात, पिछले होली-मिलन का समय था…

..बाँस-शिल्प अर्थात बाँस के बर्तन बनाने वाले चाचा जो बंसोड जाति से संबंध रखते थे. अचानक रास्ते में मुझसे मिल गये,

मैंने उनसे कहा- आइए आपके साथ एक सेल्फी ले लेता हूँ.

.. मैं उनके कंधे पर हाथ रखने वाला ही था कि, वे बोलते हैं-

नहीं, नहीं, आप मुझे छुओ मत, आपको मुझे नहीं छूना चाहिए क्योंकि मैं नीची जाति का हूं

(यह भी हीन-भावना ही थी, वे स्वयं को नीचा समझ रहे थे.)

खैर, मैंने उनके साथ एक सेल्फी ली.

वे मुस्कुराते हुए बोले- ऐसा ही एक मोबाइल मुझे भी दिला दो.

मैं- हाँ जरूर.

अब आप ही बताइए विडंबना तो है ना कि,
एक ओर जहाँ हिंदू समाज में सवर्ण-वर्ग के बहुसंख्यक लोग स्वयं को सिर्फ और सिर्फ सवर्ण-जाति में पैदा होने मात्र से प्राप्त विशेषाधिकार त्यागना नहीं चाहते, भले ही आरक्षण की बात आने पर सवर्ण-वर्ग बड़ी-बड़ी लच्छेदार बातें करे, भले ही उस समय वे यह यह कहें कि, सबको समानता का अधिकार है लेकिन जब सवर्ण-वर्ग में जन्मी कोई लड़की किसी दलित-आदिवासी के लड़के से लव-मैरिज करती है तो परिवार की नाक कट जाती है, ऑनर-किलिंग हो जाती है…

..है न हास्यास्पद?

बेहिचक मैं इस कड़वे सत्य को बयां कर सकता हूं कि, ग्रामीण क्षेत्र में हिंदू धर्म में सवर्ण-वर्ग के बहुसंख्यक लोग जन्म के आधार पर स्वयं को श्रेष्ठ समझने वाली घृणित मानसिकता का अभ्यास निरंतर, अनवरत, अबाध रूप से कर रहे हैं.

वहीं दूसरी ओर कुछ विरले लोग हैं जिसमें सवर्ण भी शामिल हैं, जो जातिवादी दंश का खात्मा चाहते हैं तो फिर सबसे बड़ी बाधा के रूप में अछूत-वर्ग का हीन भावना से ग्रस्त होना सामने आ जाता है तो आखिर कब खत्म होगा जातिवादी-दंश एवं हीन-भावना का यह घृणित

दौर..?
..जवाब की तलाश में है वैचारिक-द्वंद से जूझता हुआ एक अध्ययनरत छात्र.
अब जिन्हें लगता है कि,
“सामाजिक भेद-भाव बीते जमाने की बात हो गई है जिसका आज आधुनिक दुनिया से कोई सरोकार नहीं है” , उन लोगों को विनम्रता के साथ जवाब देने का प्रयास करना चाहिए.

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