वैचारिक-उग्रता का प्रदूषण सामाजिक-सौहार्द के पर्यावरण को प्रदूषित कर रहा है


वैचारिक-उग्रता का प्रदूषण सामाजिक-सौहार्द के पर्यावरण को प्रदूषित कर रहा है

मैं जन्मजात नास्तिक था लेकिन फिर संयोगवश मिली परवरिश ने मेरे जीवन को आस्तिकता की चादर से ढक दिया तत्पश्चात तर्क-वितर्क की हवा आस्तिकता की चादर को उड़ा ले गई और मैं समय के विकास के साथ दोबारा नास्तिक बना हूं, नास्तिकता मैंने अर्जित की है. लेकिन फिर भी मैं यह महसूस करता हूं कि, यह जो नास्तिकता की खुराक आज मेरे वैचारिक उत्कर्ष को पुष्ट कर रही है, वह खुराक दूसरे विचारों के प्रति सहिष्णुता, वैचारिक खुलापन, स्वतंत्र वातावरण सरीखे
‘इन्ˈग्रीडिअन्‍ट्‌स’ से मिलकर बनी है. इतना सब कुछ मुझे मेरे गृह-परिसर द्वारा मिला, हाँ..वही गृह-परिसर जो आज भी आस्तिकता के बरगद की शीतल छाँव से आनंदित होता है.

अब मैं,
..गर आने वाले भविष्य में अपने गृह-परिसर से यह कहने की जुर्रत करूँ कि,
“जिस आस्तिकता के बरगद की शीतल छांव तले आप आनंदित हो रहे हो, वास्तविक अर्थों में वह एक ‘आग’ है, एक ऐसी आग जो सब कुछ जलाकर राख कर देगी”

गृह-परिसर : (चिंता के सागर में डूबकर निराशा भरे शब्दों में कुछ बुदबुदाते हुये) सुनो, शायद हमारी परवरिश में कोई कमी रह गई होगी जो तुम स्वयं से अलग दृष्टिकोण रखने वाली धारा के बारे में ऐसा सोचते हो, रही बात आस्तिकता के बरगद की शीतल छाँव की तो यह मत भूलो कि,
जिस खुलेपन एवं आजादी की ऑक्सीजन से पोषित होकर, आज तुम अपने मन-मस्तिष्क में नास्तिकता का उद्यान बसा रहे हो वह इसी आस्तिकता के बरगद की शीतल छाँव की अंतिम निष्पत्ति है. अगली बार वैचारिक-असहिष्णुता की अभिव्यक्ति से पूर्व याद रखना ..गर ये शीतल छांव नहीं होती तो तुम्हारे मन में फूटे नए-नए नास्तिकता के अंकुर में हरे-हरे पत्ते निकलने से पूर्व ही उन्हें असहिष्णुता (जिसके शिकार तुम हो!) के फावड़े से अस्तित्व-विहीन कर दिया जाता.

वैचारिक-उग्रता का प्रदूषण सामाजिक-सौहार्द के पर्यावरण को प्रदूषित कर रहा है
वैचारिक-उग्रता का प्रदूषण सामाजिक-सौहार्द के पर्यावरण को प्रदूषित कर रहा है

..खैर, मैं मेरे गृह-परिसर के जवाब की कल्पना मात्र से उस आस्तिकता के विरुद्ध कुछ अनुचित कहने का प्रयास नहीं करूंगा जो वैश्विक-कल्याण की भावना से प्रेरित हो, जो धार्मिक-उन्माद को ‘ना’ कहे, जो शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को आधार प्रस्तुत करती हो.

अब ध्यान देने योग्य बात यह है कि, हमारे भारत मे मेरे गृह-परिसर सरीखे अनेंको-अनेक गृह-परिसर होंगे जिन्होंने करोड़ों-करोड़ बच्चों की परवरिश में उस खुराक का समुचित मात्रा में समावेश किया होगा जो दूसरे विचारों के प्रति सहिष्णुता, वैचारिक खुलापन, स्वतंत्र वातावरण सरीखे ‘इन्ˈग्रीडिअन्‍ट्‌स’ से मिलकर बनी है. ऐसी खुराक से पोषित बच्चा धार्मिक प्रवृत्ति का हो या नास्तिक भारत की समावेशी प्रकृति को संजोते हुये ही आगे बढ़ेगा लेकिन अफसोस कि, समाज असामाजिक-तत्वों से भरा पड़ा है. वैचारिक-उग्रता का प्रदूषण सामाजिक-सौहार्द के पर्यावरण को प्रदूषित कर रहा है. मैं नास्तिक हूं इसमें कोई बुराई नहीं है. यदि कोई आस्तिक है उसमें भी कोई बुराई नहीं है. लेकिन जब मैं नास्तिक होने के साथ-साथ अपने आसपास के लोगों पर तंज कसने लगूँ कि,
“तुम नास्तिक क्यों नहीं हो? .. लानत है तुम पर, देखो नास्तिकता कितनी खूबसूरत होती है! तुम धार्मिक होते ही अंधे हो.. कुएं के मेंढक कहीं के!”

..उपर्युक्त वर्णित वैचारिक-दहशत शांतिपूर्ण समाज की स्थापना में बाधक है. क्योंकि कोई भी विचार सत्य का एकांश मात्र होता है. हर एक जन को एक सामाजिक इकाई के रूप में समझना होगा कि,
आस्तिक होना, आस्तिकता में भी भिन्न-भिन्न धारा का अनुयायी होना, अज्ञेयवादी होना, नास्तिक होना सरीखे सारे के सारे मुद्दे व्यक्तिगत जीवन का हिस्सा हैं तो किसी के व्यक्तिगत-जीवन में उलघे बगैर व्यक्तिगत और सामूहिक उत्कृष्टता के लिये निरंतर प्रयासरत रहना, ताकि राष्ट्र लगातार उच्च स्तर की उपलब्धि हासिल कर सके, हम सब जन का नागरिक कर्तव्य है जिसे हम सभी को हर रोज जीना होगा.

ऐसी स्थिति में हर वह विचार जो हमारे मानवीय विवेक पर खरा उतरता हो, हमारी जीवनशैली की गुणवत्ता को बढ़ा रहा हो, भला ऐसे विचारों को आत्मसात करने से कैसी गुरेज़?
अब इन विचारों में, कोई भगवान को स्वामी मानकर आराधना कर सकता है, कोई मित्र भाव से तो कोई प्रेमी भाव से पूजा कर सकता है, कोई निराकार ब्रह्म की उपासना कर सकता है, कोई प्रकृति को आराध्य मान सकता है, तो कोई मानव मात्र के मानसिक, चारित्रिक एवं बौद्धिक उत्कर्ष को उच्चतम संभावित बिंदु तक विकसित करने की प्रेरणा को अपने जीवन का आदर्श मानकर आगे बढ़ सकता है साथ ही यदि कुछ विरले लोग ऐसे भी हैं जिनका विश्वास किसी भी सर्वशक्तिमान ईश्वरीय सत्ता पर नहीं है तो वे स्वयं के जीवन-मूल्यों के साथ आगे बढ़ सकते है, भला इसमें क्या बुराई हो सकती है? ..बेहतर ही है कि, हमारे समाज में गहरी-विविधता का वास हो, व्यक्तिगत-स्वतंत्रता की रक्षा हो, सामाजिक-टकराव का सर्वथा अभाव हो. किसी भी सभ्य समाज को उपर्युक्त वर्णित कसौटियों पर कसकर खुद का मूल्यांकन करना चाहिये.

सच यह है कि अब, आज हमारे समाज में खुद की वैचारिक-श्रेष्ठता को सिद्ध करने की सनक स्पष्टतः दृष्टिगोचर है और यह सनक दिन-प्रतिदिन नए-नए सामाजिक-टकराव के रूप में अभिव्यक्त हो रही है. अफसोस इस बात का है कि, वैचारिक-श्रेष्ठता की नितांत बदबूदार एकरसता से प्रभावित होकर हम हमारे समाज से गहरी-विविधता को मिटा देना चाहते है, सहिष्णुता के तत्व पर अप्रासंगिकता की बर्फ जमाने के लिए आमादा हैं जो किसी भी सभ्य समाज के लिए खतरनाक है. यदि हम सब जन शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की भावना के साथ आगे बढ़ने का संकल्प लेकर समाज मे एक-साथ रहने की चुनौती को स्वीकार करें तो यह हमारे गहरी-विविधता से भरे समाज के लिए काली अंधेरी रात की नई सुबह होगी.

वैचारिक-उग्रता का प्रदूषण सामाजिक-सौहार्द के पर्यावरण को प्रदूषित कर रहा है ( वैचारिक-उग्रता, वैचारिक-उग्रता )

image credit:- 1.wiserwoeld 2. forbes

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