तानाशाही का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर बह रहा है जो किसी भी वक्त लोकतांत्रिक भारत के टापू को अपनी गिरफ्त में ले सकता है


तानाशाही का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर बह रहा है जो किसी भी वक्त लोकतांत्रिक भारत के टापू को अपनी गिरफ्त में ले सकता है

हमारे पूर्वजो ने ख्वाबों के समंदर में लोकतांत्रिक भारत का टापू बसाया जहां विविधता का प्रकाश उदारता, सहिष्णुता, सह-अस्तित्वाद के पारदर्शी प्रिज्म से गुजरकर इंद्रधनुषी छटा बिखेर रहा होगा.

हमारे लोकतांत्रिक भारत के टापू में तर्क-वितर्क की संस्कृति निरंतर, अनवरत, चिर-स्थाई रूप से तब से चली आ रही है जब हमारा टापू ‘लोकतांत्रिक’ नही हुआ था. उल्लेखनीय है कि वैदिक युगीन भारतीय समाज में ‘सभा’ और ‘समिति’ सरीखी संस्थाओं के माध्यम से वाद-विवाद और चर्चा को बढ़ावा मिला तो मध्ययुगीन अकबर के समय यह परंपरा ‘इबादतखाना’ के रूप में निरंतर बनी रही. हमारा समाज हजारों वर्ष में ‘लोकतंत्र’ के लिए तैयार हो रहा था जिसकी मुखर अभिव्यक्ति हमारा स्वतंत्रता आंदोलन रहा जहां हमारे पूर्वजों ने लोकतांत्रिक मूल्यों को जिया, लोकतंत्र की ताकत को महसूस करते हुए समाज में लोकतंत्र की जड़ों को और मजबूत करने का प्रयास किया तत्पश्चात…

..वो दिन भी आया जब ख्वाबों के समंदर में आजादी की नई बयार बही और लोकतांत्रिक भारत के टापू ने उच्च-आदर्शों को स्थापित करते हुए स्वच्छन्द भाव से भारत के हर एक जन, चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, भाषा, लिंग, स्थान व वर्ग से संबंध रखता हो, को स्वीकार करते हुए खुद के ‘समावेशी’ होने की उद्घोषणा कर दी.

स्मरणीय है कि, इतिहास में कुछेक मौके आए जब इस टापू में अस्तित्व-संकट के बादल मंडराने लगे लेकिन अस्तित्व-संकट की लड़ाई में इसने खुद की महत्ता को प्रतिपादित करते हुए यह बखूबी सिद्ध किया कि,
“लोकतांत्रिक भारत का कोई विकल्प नहीं है.”

कालक्रम के विकास में आज लोकतांत्रिक भारत का टापू एक बार फिर वजूद की लड़ाई लड़ रहा है. ‘एकरसता’ का तूफान इंद्रधनुषी छटा पर बट्टा लगाते हुए टापू को तहस-नहस करने में आमादा है. सत्ता में अबाध अधिकार पाने की दुराशा में कुंठित राजनीति का तापमान बढ़ने के कारण तानाशाही का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर बह रहा है…

तानाशाही का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर बह रहा है जो किसी भी वक्त लोकतांत्रिक भारत के टापू को अपनी गिरफ्त में ले सकता है
तानाशाही का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर बह रहा है जो किसी भी वक्त लोकतांत्रिक भारत के टापू को अपनी गिरफ्त में ले सकता है

..और बाजारू मीडिया ने वजूद की इस लड़ाई में अपने हाथ खड़े कर दिये हैं, चंद मीडिया संस्थान जो पत्रकारिता-धर्म निभा रहे हैं उनको भी नियंत्रित करने के लिये तंत्र द्वारा हर पैंतरे आजमाए जा रहे हैं. और फिर जब कोई रिपोर्ट भारत में लोकतंत्र को लेकर सवाल उठा दे या फिर इस तथ्य को उजागर कर दे कि, भारत में लोकतंत्र कमजोर हो रहा है तो तंत्र द्वारा ‘पाखंड’ कहकर खारिज कर दिया जाता है लेकिन क्या वाकई भारत में लोकतंत्र कमजोर नहीं हो रहा है? ..अपने आस-पास निहारिये, क्या कुछ चल रहा है? .. क्या यह सच नहीं है कि, समाज में सहनशीलता में कमी आई है? ..क्या इस तथ्य से इंकार किया जा सकता कि, समाज में दिन-प्रतिदिन धार्मिक उन्माद बढ़ता जा रहा है? .. क्या आज तंत्र की तानाशाही स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर नहीं है?

गैर-लोकतांत्रिक शक्तियों द्वारा ‘देशद्रोह’ का खंजर घोंपकर अभिव्यक्ति की आजादी को रक्तरंजित किया जा रहा है. इससे क्या फर्क पड़ता है कि ‘असहमति’ लोकतंत्र का मूलभूत गुण है? ..आज हम ऐसे माहौल में रह रहे हैं जहां असहमति एक अश्लील विचार समझा जाने लगा है, आज संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग करना भी आपको ‘देशद्रोही’ बना सकता है. अब, ऐसे में आपके पास दो ही विकल्प है या तो आप जेल की सलाखों के पीछे सड़े या फिर, गली, नुक्कड़, बस या ट्रेन में या फिर सड़कों पर भीड़ आपका इंतज़ार कर रही होगी. कबीर ने कहा है “निंदक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय” लेकिन आज कबीर के विचारों पर अप्रासंगिकता की बर्फ तो जमा ही दी गई है साथ ही एक ऐसा वातावरण निर्मित किया गया जो सोचने पर मजबूर करता है कि, अगर कबीर आज 21वीं सदी के भारत में होते तो उन पर भी देशद्रोही का ठप्पा लगा दिया जाता.

स्मरणीय है कि जेएनयू में देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार छात्रों के मामले में 17 महीने के बाद भी पुलिस कोई चार्जशीट दाखिल नहीं कर पाई थी. वहीं नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार जेएनयू विवाद के बाद से लेकर अब तक देश में देशद्रोह के कुल 77 मामले दर्ज़ किये जा चुके हैं. आखिर यह सिलसिला कहाँ जाकर थमेगा? .. हम हमारे देश के ही लोगों को महज़ वैचारिक असहमति एवं सरकार की आलोचना के कारण देशद्रोही बना रहे हैं. देशद्रोह का यह खंजर, पता नही कितने बुद्धिजीवी, इतिहासकार, समाजसेवी, कलाकार, लेखक, कवि पर घोंपा गया, जो लड़ते हैं विचारों की लड़ाई, जिन्होंने अपने लेख, कला, संगीत, सेवा से देश का सिर गर्व से ऊंचा किया है; उन्हें सरकार की नीतियों की आलोचना करने पर, सरकार से सवाल पूँछने मात्र पर अर्बन नक्सल, पाकिस्तान परस्त घोषित कर दिया गया, देशद्रोही होने का आरोपी बना दिया गया.

ऐसा घुटन भरा माहौल यह कहने के लिए प्रेरित करता है कि,
“तानाशाही का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर बह रहा है जो किसी भी वक्त लोकतांत्रिक भारत के टापू को अपनी गिरफ्त में ले सकता है”

image credit :- 1. Telangana Today 2. the secondangle

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