महिला दिवस विशेष: स्वयं से लड़ो


महिला दिवस विशेष: स्वयं से लड़ो

Fight with Self… अर्थात स्वयं से लड़ो.


आग में तपकर ही कुंदन अपना रूप पाता है. ठीक उसी तरह चिंतन की आग में तपकर ही विमर्श अपने अस्तित्व में आता है. हम आज विश्व महिला दिवस के अवसर पर स्त्री विमर्श सरीखे प्रासंगिकता से ओत-प्रोत धारा में एक अनसुने-अनकहे विषय की ओर आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहेंगे जिसका नाम है- “Fight with Self” …यह स्त्री-वर्ग से एक आह्वाहन हैं. जहाँ पर self का मतलब वह व्यक्तित्व नहीं जिसे आपने अध्ययन करके, चिंतन करके, विवेकपूर्ण ढंग से अर्जित किया है अपितु यहां पर वह self है जो संयोगवश आपको परवरिश में मिल गया लेकिन दुर्भाग्यवश परवरिश में बहुत सारा कचरा भी मिल गया है. अब वह कचरा पहली नजर में, पहले एहसास में, बहुत ही खूबसूरत लगता है, आपका भला करता हुआ प्रतीत होता है लेकिन वास्तविक अर्थों में वह आपके अस्तित्व को दीमक की तरह खाये जा रहा है.

आगे आओ.. गरिमापूर्ण जीवन जीना सीखो, कुछ बोलो तो उसमें साहस हो,
संकल्प हो, आवाज काँपे नहीं, थरथराये नहीं..ये आपकी जिंदगी है, अपने हिसाब से जियो, इसे बेबसी में गुजारना बंद करो..गुलाम थोड़ी हो जो किसी ने भी हथकड़ियां पहना दी और आपने पहन ली, अब लड़ाई किसी और से नहीं खुद से है, खुद की परवरिश से है.. जब-जब भारतीय परिदृश्य में महिलाओं की बात करता हूं तब-तब, बार-बार मनु स्मृति में वर्णित यह श्लोक याद आता है-

“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:।”
.. बहुत खूब!
आपको देवी तो बना दिया लेकिन मूक रूप में बिठाना ही सभी को मनोरथ लगा. इससे यह साबित होता है कि, आपके पास सब कुछ है लेकिन प्रयोग में लाने का अवसर प्रदान नहीं किया जाता तो अगली बार जब कभी आपको देवी बोला जाए तो समझ लेना आपको घर की चहार-दीवारियों तक कैद रखने की एक कुंठित मानसिकता है, आपको आपके अवसरों से बेदखल कर देने की एक प्रबल कुटिल प्रेरणा है.

हर एक धर्म, जाति, वर्ग की इज्जत उस समाज की स्त्रियों के शरीर की पवित्रता पर टिकी हुई है..क्यों, इज्जत का सारा ठेका आपने ही ले रखा है क्या? .. खैर आपको भी गर्व महसूस होता है कि, आप अपने समाज की इज्जत को संजो रही है, सुरक्षा कवच के रूप में कार्य कर रही हैं…
.. लेकिन क्या आपने कभी इस कुंठित मानसिकता की पृष्ठभूमि खंगालने की कोशिश की?
आखिर क्यों हमारे पास ‘पतिव्रता’ धर्म तो है लेकिन ‘पत्नीव्रता’ सरीखे शब्दों का हमारे शब्दकोश में सर्वथा आभाव है?
स्त्री वर्ग को इतना सब कुछ स्वाभाविक लगता है क्योंकि आपकी रग-रग में वह विचार भरा गया है जो कुल्हाड़ी में लगे उस बेंत के समान है जिसे देखकर जंगल को यह भ्रम होता है कि यह अपनी बिरादरी का है लेकिन वास्तविक अर्थों में वह कुल्हाड़ी के साथ मिलकर जंगल को काट रहा होता है.

क्या आपने कभी विचार किया ‘पर्वत’ , ‘सागर’ सरीखे शब्द पुल्लिंग है लेकिन ‘नदी’ स्त्रीलिंग है.. आइए व्याख्यायिय करते हैं-
“नदी पर्वतों से निकलती है और सागर में मिल जाती है.” ..कुछ समझ आया
?
.. अर्थात पुरूष ही सब कुछ है, स्त्री की कोई अलग विशिष्ट पहचान नहीं है.

आइए, भारतीय दर्शन को खंगालते हैं जिसने हमारी परवरिश मे क्रांतिकारी भूमिका निभाई है. भारतीय दर्शन में यह सृष्टि ‘प्रकृति-पुरुष’ से मिलकर बनी है जहां प्रकृति के पंचतत्व ‘जड़’ हैं जबकि पुरुष ‘चेतन’ है, जीवात्मा है साथ ही इसी कड़ी में प्रकृति को प्रसवधर्मणी अर्थात स्त्री के रूप में वर्णित किया गया है अर्थात प्रकृति जगत को जन्म देने वाली होने के बावजूद भोग की वस्तु है लेकिन पुरुष तो जीवात्मा है.. अब स्त्री-वर्ग स्वयं को ‘प्रकृति’ कहकर खुश होता है तो बेशक खुश हो लेकिन अतीत पर गर्व करने से पहले, संयोग में मिले कचरे पर अनजाने में ही सही लेकिन गर्व करने से पहले थोड़ा रुककर, ठिठक कर समझना तो बनता है.

ध्यातव्य है कि, किसी दर्शन की, किसी श्लोक विशेष की या फिर हमारे परवरिश में जो हमें मिला, संभव है कि, सैद्धांतिक आदर्शवादिता में मूल भावना अलग रही हो लेकिन व्यवहारिक धरातल पर ‘स्त्रियों के शरीर की पवित्रता’ , ‘स्त्रियों को देवी कहा जाना’ या फिर ‘स्त्रियों को प्रकृति एवं पुरुष को जीवात्मा के रूप में वर्णित करना’ सरीखे विचारों को आधार बनाकर स्त्रियों के दमन को सुनिश्चित किया गया जो बेहद ही दुर्भाग्यपूर्ण था.)

ऐसे पुरुष वर्चस्व के दमनकारी माहौल में, झूठे मर्दाना गर्व के साए में यदि किसी ने भी स्त्रियों की बात कह दी, लिख दी तो उस पर ‘फेमिनिस्ट’ का ठप्पा लगा दिया जाएगा तो फेमिनिस्ट होने में शर्म के भाव जैसा कुछ भी नहीं है, एक्सट्रीमिस्म को दरकिनार करते हुए गर्व से कहिए फेमिनिस्ट हैं आप.. क्योंकि फेमिनिस्ट बनने में आपका तर्क लगा है, बुद्धि लगी है, विवेक लगा है, चिंतन में समय लगा है, आप फेमिनिस्ट ‘संयोगवश’ नहीं बने हैं तो यकीन मानिए आप विचारधारात्मक रूप से चिंतन की उस धारा से कोसों आगे होंगे जो ‘संयोग’ पर गर्व करती है.

आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि, स्त्री-वर्ग लकड़ी के बेंत से सावधान रहेगा.

धन्यवाद.

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