प्रश्न करना चेतना का प्रमाण है लेकिन इस चेतना पर पहरा क्यों ?


प्रश्न करना चेतना का प्रमाण है लेकिन इस चेतना पर पहरा क्यों_

प्रश्न करना चेतना का प्रमाण है

“तुम प्रश्न बहुत पूछते हो, बात-बात में चल दिए आलोचना करने, ऐसे में देश आगे कैसे बढ़ेगा, बताओ हम विश्व गुरु कैसे बनेंगे, हाँ..? ..हम समझते सब हैं, राजनीति विज्ञान के छात्र हो न..? ..पढ़ लिए होंगे किसी विदेशी को, है न..? ..खैर, अब क्या कहें, इन विदेशियों ने ही तो भारतीयों को बरगला रखा है।” |

..जो लोग भी उपर्युक्त वर्णित बातों से इत्तेफ़ाक़ रखते हैं उन लोगों को क्षमापूर्वक बताना चाहता हूँ कि, आप जैसे लोग, जो स्वयं के गले में पट्टा पहनकर लगाम तानाशाह को पकड़ा चुके हैं, वे ‘प्रश्न पूँछने की महत्ता’ को समझने में सर्वथा असमर्थ होंगे, आपको ‘वैचारिक-असहमति’ एवं ‘आलोचनात्मक-विचार’ अश्लील लगेंगे, मैं आपकी मनोदशा भली-भांति ढंग से समझ सकता हूँ।

आप जैसे लोगों ने ही तो मूल भारतीय विचारों पर विदेशी ठप्पा लगाकर अनर्गल बताया साथ ही वैश्विक-कचरे के ढेर को भारतीय संस्कृति का हिस्सा। हर वैचारिक-मूर्खता को भारतीय संस्कृति का चोला पहनाकर जनमानस के समक्ष परोसना कोई एक घटना नहीं है अपितु पूरी प्रक्रिया है, जिसे मौलिक विचार रखने वाले आम व्यक्तित्व स्पष्ट रूप से देख सकता हैं।

आइए, समझने की कोशिश करते हैं कि भारतीय समाज में वैचारिक-असहमति, तार्किक-विचार, प्रश्न पूछने की भावना, आलोचनात्मक-धारा का क्या स्थान है?

भारतीय संस्कृति में हम माता भूमि: पुत्रो अहं पृथिव्या के मार्ग पर चलकर वसुधैव कुटुंबकम को चरितार्थ करते हैं, हम भारतीय संस्कृति में निरंतरता, चिरस्थायिता, आध्यात्मिकता, समन्वयवादिता, धार्मिक सहिष्णुता, विविधता में एकता, सार्वभौमिकता जैसे अनेकों-अनेक विशेषताओं को आत्मसात करते हैं लेकिन इन सब से इतर समझने का प्रयास करेंगे कि आखिर कैसे इंटेलेक्चुअल ऑटोनोमी अर्थात बौद्धिक स्वायत्तता भारतीय संस्कृति की आत्मा में निवास करती है जिसके आधार स्तंभ वैचारिक-असहमति, तार्किक-विचार, प्रश्न पूछने की भावना, आलोचनात्मक-धारा जैसे तत्व हैं।

यही भारतीय संस्कृति ही तो समाज की पूरक रही है।

बेहतर होगा यदि हम बौद्धिक स्वायत्तता के मूल अर्थ को समझ लें-

बौद्धिक स्वायत्तता से तात्पर्य है कि, जब हम अपनी मान्यताएं, अपनी विश्वास, अपनी विचारधारा को निर्धारित कर रहे होते हैं तब अंधानुकरण के बजाय स्वयं के मौलिक चिंतन पर बल देते हैं, हम क्या सोचते हैं, हमारा खुद का मानवीय विवेक क्या कहता है उसे तार्किक आधार पर आत्मसात करना ही बौद्धिक स्वायत्तता है।

हम भारतीय जनों को एक बात बहुत ही स्पष्ट शब्दों में समझ लेने की आवश्यकता है कि जब हमारा जन्म स्वतंत्र रूप से हुआ, हमारी परवरिश, हमारे वातावरण स्वतंत्र रूप से भिन्न-भिन्न रहे, हमारी वैचारिक प्रक्रिया के निर्माण के आधार स्तंभ अलग-अलग रहे हैं तो स्वाभाविक तौर पर हमारे विचार किसी विषय विशेष को लेकर भिन्न-भिन्न होंगे तो आखिर हम क्यों किसी वर्ग-विशेष, विचारधारा-विशेष के विचारों को अंधानुकरण के आधार पर आत्मसात करें, क्यों ना हम स्वयं के विवेक के आधार पर हमारी बौद्धिक स्वायत्तता को बनाए रखें…

क्योंकि बौद्धिक स्वायत्तता भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है, उदाहरणार्थ-

  1. नचिकेता अपने पिता से इतने सारे प्रश्न पूछते है तो पिता क्रोधित होकर श्राप दे देते हैं कि— जा, तू यम को प्राप्त हो जा तत्पश्चात नचिकेता-यमराज के बीच हुआ पूरा संवाद ही अनेकों अनेक प्रश्नों से भरपूर है।
  2. सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत गीता मानव मन मस्तिष्क में उठी सामान्य जिज्ञासाओं एवं प्रश्नों का समाधान है अर्थात प्रश्नों से भरपूर है।
  3. मक्खलि गोशाल की की हत्या तो नहीं कर दी गई क्योंकि उन्होंने ईश्वर पर प्रश्न किया था, मोक्ष जैसे सिद्धांत को अप्रमाणित बता दिया, ईश्वर को हास्यास्पद बना दिया था।
  4. महर्षि चार्वाक की बौद्धिक स्वायत्तता को संरक्षण प्रदान किया गया। रोचक है ना कि हम नास्तिक को भी महर्षि कहकर बुला रहे हैं। महर्षि चार्वाक ने स्थापित मान्यता पर प्रश्न किया अपने स्वयं के मत को प्रतिपादित किया। पुनर्जन्म को नकार दिया—

यावज्जीवेत सुखं जीवेद ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत, भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ॥

अर्थ है कि जब तक जीना चाहिये सुख से जीना चाहिये, अगर अपने पास साधन नहीं है, तो दूसरे से उधार लेकर मौज करना चाहिये, शमशान में शरीर के जलने के बाद शरीर को किसने वापस आते देखा है?

  1. आर्यभट्ट, वराहमिहिर सरीखे व्यक्तित्वों ने यदि अपने मत को स्थापित नहीं किया होता, क्वेश्चन नहीं किए होते, क्या होता?
  2. आज हमारी धार्मिक भावनाएं बात बात में ऐसे आहत होती हैं कि, कभी-कभी तो मुझे लगता है कि कबीर अगर आज होते तो क्या हम उन्हें जिंदा रहने देते.. एक बार स्वयं से पूछना तो बनता है, शायद उन्हें भी काशी नगरी में कोई सरेआम गोली मार देता या फिर कोई चार धर्मांध सरेआम उनकी हत्या कर देते।

मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि क्या आज हमारा भारत बौद्धिक स्वायत्तता का संरक्षण कर पाने में समर्थ है, हम देखते हैं कि जिन-जिन बुद्धिजीवियों ने बौद्धिक स्वायत्तता की अभिव्यक्ति की, उसको व्यवहार में उतारने का प्रयास किया उन्हें अपने जान से हाथ धोना पड़ा, चाहे हम बात करें कलबुर्गी-दाभोलकर की या फिर हो गौरी लंकेश।

मैं दुख के साथ कह रहा हूं कि अब हम सहिष्णुता पर सिर्फ डफली पीटते हैं, सहिष्णुता होती तो बौद्धिक स्वायत्तता बरकरार रहती। असहमति को कुचला नहीं जाता। हमारा इतिहास हमारे पूर्वजों द्वारा पूछे गए प्रश्न मात्र है, वही इतिहास जिस पर हमें गर्व करना सिखाया जाता है, वही संस्कृति जिसके सर्वश्रेष्ठ होने के दावे मैं बचपन से सुनता आया हूँ, एक बात तो स्पष्ट है अगर हमारे इतिहास में प्रश्नकर्ता नहीं होते, यदि प्रश्न नहीं पूछे गए होते तो हमारा इतिहास कुछ नहीं होता, जी हां हमारा इतिहास कुछ होता ही नहीं लेकिन भारतीय संस्कृति के आधार स्तंभ से आज इतनी नफरत क्यों?

हमने बखूबी देखा है कि कैसे यूरोप में चर्च ने वीभत्सता के सारे पैमानों को तोड़ा था। प्रश्न पूछने वाले वैज्ञानिकों एवं बुद्धिजीवियों को जिंदा जला दिया गया। चर्च द्वारा प्रकट किए गए मत को नकार कर आप स्वयं की बौद्धिक स्वायत्तता को नहीं प्रदर्शित कर सकते थे। स्वयं के मत का प्रतिपादन नहीं कर सकते थे। कम से कम भारतीय संस्कृति में बौद्धिक स्वायत्तता के संदर्भ में ऐसा घृणित स्वरूप तो नहीं देखा गया, तो आज आखिर क्यों हम वर्तमान अथॉरिटी से प्रश्न करने से कतराते हैं, स्मरणीय है कि अगर सुकरात, मार्टिन लूटर गैलीलियो ने तत्कालीन अथॉरिटी चर्च पर क्वेश्चन नहीं किए होते तो इतिहास, पुनर्जागरण सरीखी चेतना रूपी बयार से अछूता रह जाता।

वर्तमान भारत में स्थिति सामान्य तो नहीं कही जा सकती जिस तरह से हम असामान्य घटनाओं को स्वाभाविक रूप से स्वीकार करने लगे हैं वह कहीं न कहीं हमारे नैतिक ह्वास को परिलक्षित करता है। जिन घटनाओं को सुनकर चीखकर विचलित हो जाना चाहिए, ऐसी घटनाओं की समाज में स्वाभाविक स्वीकार्यता, उन घटनाओं को बार बार घटित होने के लिए, हरी झंडी दे रही है।

आज अनेकों-अनेक लेखकों और संस्कृतिकर्मियों, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, जो हमेशा प्रतिपक्ष का कार्य करते हैं, को असहमति प्रकट करने पर, प्रश्न पूछने सरीखे युगधर्म का पालन करने पर तथाकथित देशद्रोह का केस लगाकर सलाखों के पीछे बंद किया जा रहा है। ऐसी अनेकों अनेक घटनाओं को उद्धृत किया जा सकता है, जो इस कहानी को बखूबी बयां कर रही है कि वर्तमान में हम, हमारे समाज की सबसे बड़ी विशेषता ‘असहमति’ को सुरक्षा नहीं प्रदान कर पा रहे हैं।

हाँ,
वही ‘असहमति’ जो प्रगति के मार्ग को प्रशस्त करती है लेकिन यह लिखते हुए लेखनी कम्पायमान हो रही है कि, आज हमारी ‘असहमति’ खतरे में है।

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