क्या भारतीय लोकतंत्र में संवाद हाशिए पर जा रहा है?


क्या भारतीय लोकतंत्र में संवाद हाशिए पर जा रहा है_

वैचारिक प्रवाह थमता हुआ नजर आ रहा, संवाद हाशिए पर जा रहा है, असहमति की लेखनी कम्पायमान हो रही है…यह हो क्या रहा है?

बेशक!
वे लोग जो संवाद को हाशिए पर डालना चाह रहे हैं, वे भारतीय लोकतंत्र ही नहीं अपितु भारतीय परंपरा से द्रोह कर रहे हैं. हमारी पीढ़ी इस तथ्य को बखूबी समझती है कि, आज से पहले, वर्तमान में साथ ही आने वाले भविष्य में भी लोकतंत्र में संवाद की परंपरा गौण नहीं हो सकती लेकिन इस तथ्य से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि, हर एक लोकतंत्र में एक ऐसा दौर आता है, जब संवाद धूमिल होने लगता है.

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भारतीय लोकतंत्र में संवादहीनता के लिए…
“..वह नहीं अकेला इसका उत्तरदायी है,
है एक प्रेरणा उसके पीछे प्रबल कुटिल.”

भारतीय लोकतंत्र में संवाद हीनता नासूर बन गई है जिससे घुटन का मवाद निरंतर, अनवरत, अबाध रूप से बह रहा है. यह संवाद हीनता कोई एक घटना नहीं अपितु पूरी प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत सर्वप्रथम भारतीय लोकतंत्र के तथाकथित चतुर्थ स्तंभ के साथ-साथ भारतीय समाज ने भी विकृत संवाद को मान्यता प्रदान की साथ ही एक ऐसी व्यवस्था गढ़ी गई जिससमें अच्छा वक्ता होना बेहतर समझा जाने लगा. जब अच्छा वक्ता होना ही सत्य के साथ साथ बेहतर इंसान होने की कसौटी बन गया तब हमने जोश के साथ हाथ उठाकर बोलने वालों की बातों पर प्रश्नचिन्ह लगाना मुनासिब नहीं समझा परिणाम स्वरूप आत्ममुग्ध भाषणखोर ने स्वयं की बातों को परमसत्य समझने का भ्रम पाल लिया. इसी के समांतर भारतीय लोकतंत्र में एकतरफा संवाद का दीमक लगना प्रारम्भ हुआ जिसमें भक्ति-भाव में लीन आम जनता ने प्रवचन तो सुने लेकिन भाषणखोर प्रभु ने तो आम जन-मानस की पुकार को अनसुना कर दिया…खैर भक्ति का उसूल ही यही है.

अब, जब इतना कुछ घटित हो रहा हो तो भाषण खोर के ईगो का चरमोत्कर्ष पर होना लाजमी है, जब भाषणखोर के मन-मस्तिष्क में स्वयं के भारत-भाग्य-विधाता होने की कुंठित प्रेरणा हो तब संवाद नहीं हो सकता सिर्फ प्रवचन दिए जा सकते हैं.
अतएव भारतीय लोकतंत्र में संवाद का हाशिए पर जाना स्वाभाविक तो है लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है.

स्मरणीय है कि, गांधीजी कोई अच्छे वक्ता नहीं थे, शायद ही उन्होंने कोई बात आवेश में आकर कही होगी लेकिन आज कालक्रम के विकास के साथ राजनीति का आधुनिकीकरण, भारतीय लोकतंत्र का राजनीतिकरण करता जा रहा है जहाँ नेता चिल्ला-चिल्ला भाषणखोरी कर रहा है, ऐसा लग रहा है गला फट जाएगा लेकिन आम जन-मानस एवं नेता के दरमियान विश्वास के अंकुर प्रस्फुटित नहीं हो रहे हैं.

हर एक जन को समझना होगा कि, जब-जब संवाद गौण होता है, तब-तब घुटन महसूस होती है. जब-जब असहमति अश्लील होती है तब-तब गैर-लोकतांत्रिक शक्तियों के कुंठित मंसूबे समाज में स्वीकार्य होने लगते हैं. जब-जब प्रश्न करना अपराध होता है तब तब लोकतंत्र की हार होती है. ऐसे में आज हमारे समाज को, हमारे भारत को जरूरत है प्रेम की, संवेदना की, आज हमारे लोकतंत्र के लिए सबसे जरूरी है कि, “बात कही जाए, बात सुनी जाए” नहीं तो एकतरफा संवाद का दीमक लोकतंत्र की जड़ों को काट देगा.

अस्वीकरण:
इस आलेख में प्रयोग की गई उपमाएं किसी व्यक्ति विशेष के लिए ना होकर सिर्फ प्रतीकात्मक है.

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