आखिर क्यों ?


आखिर-क्यों_

हम उस परंपरा से आये हैं या फिर यूं कहें कि एक सामान्य भारतीय उस वातावरण से आया है जिस वातावरण में स्कूल बैग, बुक्स एंड नोट्स पर पैर टच हो जाने के कारण हम बुक्स या नोट्स के प्रति सॉरी का भाव रखते हैं, बुक पर हाथ टच करते हैं फिर उसे माथे से लगाते हैं और नमन करते हैं, एक प्रकार से हम माफी मांग रहे होते हैं। मैं पूछता हूँ कि आखिर क्यों ..हम इस पूरी प्रक्रिया को तब क्यों पूरा नहीं करते, तब हमारे मन-मस्तिष्क में सॉरी का भाव क्यों नहीं आता जब हमारी बुक्स एवं नोट्स पर हमारे शरीर का कोई भी अन्य अंग टच होता है?

आखिर क्यों हम बुक्स से तभी मांफी मांग रहे होते हैं जब उस पर हमारा पैर टच होता है?

कहीं ना कहीं हम हमारे पैर, जो हमारे लिए ठीक उतना ही जरूरी है जितना कि हमारा दिमाग, हेय दृष्टि से देखते हैं, शायद हम हमारे पैरों के साथ अनजाने में ठीक उसी प्रकार दोहरा व्यवहार करते हैं जिस प्रकार समाज के एक निश्चित वर्ग, जिन्हें हम अछूत कहते हैं, के साथ करते आये हैं।


इस विडंबना भरी स्थिति में मुझे मजबूरन कहना पड़ता है कि, जो इंसान स्वयं के शरीर को समान दृष्टि से नहीं देख पाया, वह समाज में क्या ख़ाक समानता स्थापित करेगा?

ऐसा भी प्रतीत होता है कि, शायद भेदभाव ही एकमात्र सनातन विचार है, जो हमारी रग-रग में भरा हुआ है, छोड़ देनी चाहिए हमें समानता की बात करना, शायद हम नहीं स्थापित कर सकते समाज में समानता।

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